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30.9.26

महाराजा यदु से श्रीकृष्ण तक, अहीर से यादव कैसे बने, यादवों के 18 गोत्रों का सच

                  



 महाराजा यदु से श्रीकृष्ण तक, अहीर से यादव कैसे बने, यादवों के 18 गोत्रों का सच
"आपने सुना होगा कि कृष्ण जी अहीर थे... किसी ने कहा यादव थे... और अंग्रेजों की किताबों में लिखा है कि अहीर तो सिर्फ ग्वाले थे।
तो सच क्या है? क्या अहीर और यादव अलग हैं?
महाराजा यदु, जिनके नाम पर पूरे यादव वंश का नाम पड़ा, उन्हें उनके ही पिता ययाति ने श्राप क्यों दिया था?
और आज जिन 18 गोत्रों पर यादव समाज बंटा है, उन 18 गोत्रों का कनेक्शन सीधे द्वारका के यदुवंशियों से कैसे है?
आज इस एक वीडियो में हम ऋग्वेद से लेकर भागवत पुराण तक, और अंग्रेजों के Census से लेकर 2024 की DNA रिपोर्ट तक, सारे सबूत खोल देंगे। आखिर तक देखना, क्योंकि आखिर में मैं बताऊंगा वो एक गोत्र जो आज भी अपने आप को श्रीकृष्ण का सगा वंशज मानता है।"
नमस्कार, मैं हूँ  डॉ . दयाराम आलोक और आप देख रहे हैं ज्ञानोदय चैनल 
दोस्तों, भारत में यादव समाज की जनसंख्या लगभग 20 करोड़ से ज्यादा है, जो इसे भारत की सबसे बड़ी OBC जातियों में से एक बनाती है। बिहार से लेकर हरियाणा तक, राजनीति से लेकर सेना तक, हर जगह यादवों का दबदबा है।
लेकिन जब इतिहास की बात आती है तो 3 अलग-अलग कहानियाँ सुनाई देती हैं। पहली, पौराणिक। दूसरी, अंग्रेजों वाली। और तीसरी, आज की राजनीति वाली।
आज हम बिना किसी पक्षपात के, सिर्फ ग्रंथों और शिलालेखों के आधार पर बात करेंगे। तो वीडियो को अभी लाइक कर दीजिए, क्योंकि यह रिसर्च आपको कहीं और नहीं मिलेगी, और ऐसे ही अनसुने इतिहास के लिए चैनल को सब्सक्राइब करके बेल आइकॉन दबा दीजिए।
महाराजा यदु की उत्पत्ति - श्रापित राजकुमार से यदुवंश की शुरुआत
कहानी शुरू होती है चंद्रवंश से।
ब्रह्मा जी से चंद्रमा, चंद्रमा से बुध, बुध से पुरुरवा। पुरुरवा वही राजा हैं जिन्होंने प्रयाग में पहला साम्राज्य बसाया। उनकी कई पीढ़ियों बाद आए राजा नहुष, और नहुष के पुत्र हुए महाराजा ययाति।
ययाति चक्रवर्ती सम्राट थे। उनके दो पत्नियाँ थीं - देवयानी और शर्मिष्ठा। देवयानी से दो पुत्र हुए - यदु और तुर्वसु। शर्मिष्ठा से तीन पुत्र हुए - द्रुह्यु, अनु और पुरु।
अब यहाँ ट्विस्ट आता है। ययाति ने शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी से वादा किया था कि वो दूसरा विवाह नहीं करेंगे, लेकिन उन्होंने शर्मिष्ठा से विवाह कर लिया। जब देवयानी को पता चला तो उन्होंने अपने पिता शुक्राचार्य को बताया। शुक्राचार्य ने क्रोध में ययाति को श्राप दिया - "तुम असमय ही बूढ़े हो जाओगे।"
ययाति बूढ़े हो गए। उन्होंने अपने पुत्रों से कहा - "अपनी जवानी मुझे दे दो, ताकि मैं कुछ साल और भोग कर सकूँ।" बड़े पुत्र यदु ने साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा - "पिताजी, भोग से कभी तृप्ति नहीं मिलती, जैसे घी डालने से आग नहीं बुझती।"
ययाति क्रोधित हो गए। उन्होंने यदु को श्राप दिया - "मैं तुम्हें राज्य के उत्तराधिकार से वंचित करता हूँ। तुम्हारे वंश में कोई भी राजा चक्रवर्ती सम्राट नहीं बनेगा, लेकिन तुम्हारे वंश में स्वयं भगवान विष्णु अवतार लेंगे।"
यही श्राप वरदान बन गया। सबसे छोटे पुत्र पुरु ने अपनी जवानी दे दी, और वो चंद्रवंश के मुख्य राजा बने, उन्हीं के वंश में आगे चलकर कौरव-पांडव हुए। और यदु, जिन्हें राज्य से निकाला गया, उन्होंने नर्मदा और चंबल के बीच अपना नया राज्य बसाया। उसी से बना - यदुवंश।
तो पहली बात क्लियर - यदु क्षत्रिय थे, चंद्रवंशी क्षत्रिय। ऋग्वेद में भी 'यदु' नाम एक शक्तिशाली जन का नाम है।
यदु के 5 पुत्रों का वर्णन भागवत पुराण में है - सहस्त्रजित, क्रोष्टु, नल, नहुष और पुरुजित। इन्हीं से यादवों की अलग-अलग शाखाएं बनीं। क्रोष्टु के वंश में आगे चलकर हुए वृष्णि, और वृष्णि के वंश में हुए श्रीकृष्ण।
श्रीकृष्ण तक का सफर - अहीर कैसे जुड़ा 
अब सवाल है - कृष्ण को अहीर क्यों कहा जाता है?
जब कंस को आकाशवाणी हुई कि देवकी का आठवां पुत्र उसे मारेगा, तो उसने वसुदेव-देवकी को कारागार में डाल दिया। वसुदेव यदुवंशी थे। लेकिन कृष्ण का जन्म होते ही वसुदेव उन्हें गोकुल में नंद बाबा के यहाँ ले गए।
नंद बाबा कौन थे? भागवत पुराण, स्कंध 10 में साफ लिखा है - नंद महाराज गोपों और अहीरों के अधिपति थे। गोकुल, वृंदावन, बरसाना में उस समय अहीर समाज रहता था, जिनका मुख्य व्यवसाय गौ-पालन था।
संस्कृत में अहीर शब्द का संधि-विच्छेद है - अहि + ईर। अहि मतलब सर्प, ईर मतलब मारने वाला। कालिया नाग को मारने वाले कृष्ण के वंशज होने से भी ये नाम पड़ा, ऐसा कुछ विद्वान मानते हैं। दूसरा अर्थ है - 'अभि + ईर' - मतलब चारों तरफ से रक्षा करने वाला, जो गायों की रक्षा करे।
तो श्रीकृष्ण जन्म से यदुवंशी क्षत्रिय थे, लेकिन कर्म और पालन-पोषण से अहीर-गोप कहलाए। इसलिए महाभारत में अर्जुन उन्हें कई बार 'गोविंद' - गायों के रक्षक - कहते हैं।
जब कृष्ण ने मथुरा छोड़कर द्वारका बसाई, तो पूरे यदुवंश - वृष्णि, अंधक, भोजक, सात्वत - सब द्वारका चले गए। द्वारका के डूबने के बाद यदुवंश बिखर गया। महाभारत के मौसल पर्व में लिखा है कि यदुवंशी आपस में लड़कर नष्ट हो गए और बचे हुए लोग अलग-अलग दिशाओं में चले गए।
यही बिखरा हुआ यदुवंश आगे चलकर अलग-अलग नामों से जाना गया - जादौन, भाटी, जाडेजा, चूड़ासमा, अहीर, ग्वाला, गोप।
 अहीर से यादव कैसे बना? - अंग्रेजों का खेल 
यह सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मुगल काल और उससे पहले तक दस्तावेजों में आपको 'यादव' शब्द बहुत कम मिलेगा। आपको मिलेगा - अहीर, गोप, ग्वाला, आभीर।
आभीर शब्द सबसे पुराना है। महाभारत में आभीरों का जिक्र है। ईसा से 150 साल पहले पतंजलि ने भी आभीर का जिक्र किया है। 10वीं सदी के शिलालेखों में अहीर राजाओं को 'आभीर' कहा गया है।
तो फिर यादव शब्द कब वापस आया?
1920 के दशक में। उत्तर प्रदेश, बिहार में आर्य समाज के प्रभाव से, और एक बड़े नेता की वजह से - राव बहादुर बलदेव सिंह जी। उन्होंने 1910 में 'यादव महासभा' बनाई और नारा दिया - "अहीर, ग्वाला, गोप सब एक हैं, हम सब यदु के वंशज हैं, इसलिए हम यादव हैं।"
अंग्रेजों ने 1901, 1911, 1921 की जनगणना में अहीरों को ग्वाला, दूध बेचने वाली जाति में गिना था। इससे बचने के लिए और क्षत्रिय पहचान को वापस पाने के लिए, पूरे अहीर समाज ने अपने आप को 'यादव' लिखना शुरू कर दिया। 1931 की जनगणना तक आते-आते 90% अहीरों ने अपना टाइटल यादव लिख दिया।
तो अहीर से यादव बनना जाति बदलना नहीं था, बल्कि अपनी पुरानी वैदिक पहचान को वापस पाना था। इसलिए आज आप किसी के आधार कार्ड पर अहीर और किसी पर यादव देख सकते हैं - दोनों एक ही हैं।
18 गोत्रों का सच -
कई जगह 18 गोत्र, कई जगह 20 गोत्र बताए जाते हैं। हम सबसे प्रमाणित लिस्ट की बात करेंगे जो भागवत पुराण और कौटिल्य के अर्थशास्त्र से मिलती है।
यादवों के गोत्र असल में ऋषियों पर नहीं, बल्कि यदु के पुत्रों और द्वारका के गणों पर आधारित हैं। मुख्य 18 गोत्र ये हैं:
1. अत्री गोत्र - ये सबसे सम्मानित माना जाता है, नंद बाबा इसी गोत्र से थे।
2. भरद्वाज / भारद्वाज -
3. दधिक्रत / दधीच -
4. गौतम -
5. वत्स / बच्छ - ये उत्तर प्रदेश में बहुत ज्यादा है।
6. कौशिक -
7. वशिष्ठ -
8. कश्यप - कृष्ण के गुरु सांदीपनि इसी गोत्र से थे।
9. बाण / अफरिया - हरियाणा के राव तुलाराम इसी गोत्र से थे।
10. नंदवंशी -
11. यदुवंशी - जो सीधे अपने आप को कृष्ण का वंशज मानते हैं, जादौन राजपूत भी इसी में आते हैं।
12. कृष्णौत - बिहार में सबसे ज्यादा।
13. मजरौठ -
14. गोवल / ग्वालवंशी -
15. भाटी / भट्टी - जैसलमेर के राजा भाटी यादव थे।
16. जादौन / जाधव - महाराष्ट्र के जाधव और करौली के जादौन एक ही हैं।
17. बनाफर - आल्हा-ऊदल बनाफर यादव थे।
18. ठेठवार / ठाकुरिया -
याद रखिए, गोत्र का मतलब होता है कि आप एक ही पूर्वज के वंशज हैं, इसलिए एक ही गोत्र में विवाह नहीं होता। हरियाणा में आज भी अफरिया गोत्र के लोग अपने आप को रेवाड़ी के अहीरवाल का असली वारिस मानते हैं।
इन 18 गोत्रों के अलावा भी क्षेत्र के हिसाब से उप-गोत्र बन गए, जैसे - लोरिया, बऊरिया, दहिया। इसलिए कई जगह 52 गोत्र तक गिने जाते हैं, लेकिन मूल जड़ यही 18 हैं।
तो दोस्तों निष्कर्ष क्या निकला?महाराजा यदु चंद्रवंशी क्षत्रिय थे, उन्हें राज्य से निकाला गया तो उन्होंने अपना यदुवंश बसाया।
श्रीकृष्ण उसी यदुवंश में वृष्णि शाखा में पैदा हुए, लेकिन गोकुल में अहीरों के बीच पले-बढ़े इसलिए अहीर और यादव दोनों कहलाए।
अहीर, गोप, आभीर, ग्वाला - ये व्यवसायिक नाम थे, यादव वंशिक नाम है। 1920 में समाज ने फिर से यादव नाम अपनाया।
18 गोत्र कोई काल्पनिक लिस्ट नहीं है, ये द्वारका के 18 गणों से बनी है जो द्वारका डूबने के बाद भारत में फैल गए।
अगर आपको अपना इतिहास पता होना गर्व की बात लगती है तो कमेंट में अपना गोत्र और जिला जरूर लिखें - जय यदुवंश, जय श्रीकृष्ण।
मैं अगले वीडियो में बताऊंगा - "राव तुलाराम ने अंग्रेजों के खिलाफ 1857 में पहला यादव युद्ध कैसे लड़ा था और दिल्ली को कैसे घेरा था?" वो कहानी किसी किताब में नहीं है।
तो उस वीडियो को मिस ना करने के लिए चैनल को सब्सक्राइब करके बेल आइकॉन को ALL पर सेट कर दीजिए।
वीडियो को अपने सभी यादव भाईयों तक शेयर कर दीजिए। धन्यवाद।
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